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गौरेला पेंड्रा मरवाही

ई इन सी कटारे एवं चीफ़ इंजीनियर शर्मा की छत्रछाया में ठेकेदार की मनमानी पीएमजीएसवाई की करोड़ों की सड़कें महीनों में तबाह

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही ।जिले में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत बनी सड़कों की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि विभाग ने एक ऐसे ठेकेदार को संरक्षण दे रखा है, जिसे ब्लैकलिस्ट होना चाहिए था। यह ठेकेदार वर्षों से इस इलाके में काम कर रहा है और अपनी मनमानी के लिए बदनाम है।

स्थानीय स्तर पर अधिकारी उसके रसूख से खौफ खाते हैं। वजह साफ है यह ठेका कंपनी खुलेआम राजधानी रायपुर से डील करता है और ईएनसी के.के. कटारे तथा चीफ़ इंजीनियर हरिओम शर्मा के नाम का धौंस दिखाता है। बताया जाता है कि इन दोनों अफसरों तक इसका हिस्सा नियमित पहुँचता है।

हरिओम शर्मा वही अफसर हैं, जिनकी नियुक्ति 1984 में ही फर्जी तरीके से आरक्षित पद पर की गई थी और शर्त थी कि जैसे ही योग्य उम्मीदवार आएगा, इनकी सेवा स्वतः समाप्त हो जाएगी। लेकिन 40 साल बाद भी न सेवा समाप्त हुई, न ही जांच। उल्टा, आज वही साहब चीफ़ इंजीनियर की कुर्सी पर बैठकर एनआरडीए, पीएमजीएसवाई, मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना और ब्रिज प्रोजेक्ट्स जैसे बड़े विभागों को चला रहे हैं। जिन्हें जांच के कटघरे में होना चाहिए, वे ठेकेदारों की मिलीभगत से प्रदेश को खोखला कर रहे हैं।
योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये की लागत से बनी सड़कें कुछ ही महीनों में जर्जर हो रही हैं। हालात इतने खराब हैं कि विभाग अब जगह-जगह सीमेंट का पैचवर्क करवाकर लीपापोती कर रहा है। सड़क पर टार की परत कम और सीमेंट ज्यादा दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोग कहते हैं कि अगर यही करना था तो पहले ही सीसी रोड बना देना चाहिए था।
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क निर्माण में मानकों की खुलेआम अनदेखी की गई है। किनारों पर साइड बेस तक नहीं डाला गया, उखड़ती परतों से सड़क की मोटाई बेहद पतली नजर आ रही है। कई बार शिकायतें करने के बावजूद न तो विभागीय जांच हुई और न ही किसी तरह की कार्रवाई।
पेंड्रा ब्लॉक में बम्हनी रपटा से जिल्दा-बरौड़ी तक 6 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण करोड़ों रुपये की लागत से हुआ था। लेकिन सड़क बने अभी कुछ ही महीने हुए हैं और यह पुरी तरह टूट चुकी है। जगह-जगह गड्ढे हो गए, गिट्टियां निकल चुकी हैं और कई हिस्सों में गहरी दरारें पड़ गई हैं। तस्वीरों से साफ है कि सड़क का निर्माण मानक तारकोल से नहीं, बल्कि मिट्टी और घटिया सामग्री से किया गया।


दिलचस्प बात यह है कि हरिओम शर्मा खुद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक भी बताते हैं और संघ का हवाला देकर पूरे प्रदेश में कर्मचारियों पर दबाव जमाते हैं। विभागीय अधिकारी-कर्मचारियों और ठेकेदारों से हिस्सेदारी वसूलने का आरोप भी उन्हीं पर है। सवाल यह उठता है कि क्या विष्णुदेव सरकार का यही सुशासन है? और क्या भाजपा व संगठन ने इसी तरह के अफसरों को संरक्षण देने के लिए अच्छे दिन का वादा किया था? यह विचारणीय प्रश्न है, जिसका जवाब अब सत्ता और संगठन दोनों को देना होगा।